कुछ अनकही सी ............!

अपने बारे में क्या बतलाऊं तुझे .....कोरा कागज हूँ.. कोरा पानी हूँ....! हौसले आसमान छूते हैं... थोड़ी पागल हूँ....थोड़ी ज्ञानी हूँ...!!!

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एक सिरा !!!

Posted On: 1 Aug, 2013 Others में

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वो उलझनों के
धागे का एक सिरा
जो मैंने वर्षों पहले
तुम्हारे हाथों में थमाया था
कभी समान्तर चले
कभी आगे पीछे
पर चलते रहे निरंतर
हम दोनों के हाथ अब भी
एक एक सिरा है
न वादों की गांठें थी
न ही कसमों की
एक अनकहे संकल्प
के तरुवर की छाया थी
कल रात राह में भी
हम समान्तर सिरा थामे
कुछ ही कदम चले थे क़ि
उलझनों का वो धागा
सिमट गया था लेकिन
सिरा अब भी हमारी
उँगलियों के बीच उलझा हुआ था
!!! $hweta !!!

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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Nikhil के द्वारा
August 6, 2013

saarthak rachna. badhai

    Shweta के द्वारा
    August 19, 2013

    हार्दिक आभार रचना के सराहना के लिए ……. सादर

Madan Mohan saxena के द्वारा
August 1, 2013

वाह . बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति कभी यहाँ भी पधारें और टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |

    Shweta के द्वारा
    August 2, 2013

    सादर आभार सराहना हेतु …….

    Shweta के द्वारा
    August 2, 2013

    Thank u so much


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