कुछ अनकही सी ............!

अपने बारे में क्या बतलाऊं तुझे .....कोरा कागज हूँ.. कोरा पानी हूँ....! हौसले आसमान छूते हैं... थोड़ी पागल हूँ....थोड़ी ज्ञानी हूँ...!!!

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मेरे पापा मेरी यादों में ..............

Posted On: 16 Jun, 2013 Others में

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मेरे पापा मेरी यादों में …………..
एक धुंधली सी याद हमेशा मेरे साथ रहती है ……….मुझे आज भी याद है वो पल …..जब मैं करीब तीन बरस की थी और मेरे बाएं हाथ में फ्रेक्चर हो गया था और रात के २ बजे जब आप घर आये मुझे दवा लगायी बेंडडेड किया और मेरे दर्द को महसूस कर आप अपनी गोद में चिपका कर रोते हुए सो गए थे …पापा मुझे वो भी पल याद है जब मेरे पावं पायल से कट गए थे ……आपको मेरे पावं में पायल बहुत पसंद थे घुंघरु वाले ……मुझे वो घाव भी प्रिय लगते थे ….माँ को मैं पायल निकालने नही देती थी ….और जब जूतों से मेरे पावं कटे थे …….आपने दुसरे दिन ही नेपाल से काले वाले मखमली जूते मंगवाए थे …….लेकिन इस दर्द को मैंने आपकी आँखों में तब देखा था जब मैं पहली बार ससुराल से ८ दिनों बाद लौटी थी भारी-भारी पाज़ेब ने उँगलियों में बड़ी बिछिया से मेरे पावं खूब ज़ख़्मी हुए थे जिन्हें देख कर आप रो पड़े थे और उनपर मरहम लगाया था ……..
बचपन में जब भी मैं स्कुल टूर पर या कैंप के लिए जाती आपका वक़्त काटे नही कटता था और आप मेरे लिए रो पड़ते थे ……..दिन गिनते थे कब लौट के आउंगी …………माँ आप पर हँसती थी ……कहती थी जब ससुराल जाएगी तो क्या साथ जाइएगा ..आप पर कुछ असर न होता
आपके मन में हमेशा इस बात की पीड़ा थी कि आप मुझे स्कुल छोड़ने या लेने कभी नही गए ……जब मैंने अपनी बेटी को स्कुल में डाला तो आप उसका बैग ख़ुशी ख़ुशी खुद ही टांग लेते जैसे कोई छोटा बच्चा और कहते बेटा माँ को जाने दे नाना और नातिन स्कुल चलेंगे और सब साथ ही लौट आयेंगे …..जानते हैं पापा मैंने वो पल आज भी सहेज कर रखा है अपनी आँखों में ……….
मुझे अब भी याद है जब हम साथ साथ घर से निकलते थे आप अपने ऑफिस के लिए और मैं अपने institute के लिए …और रस्ते में हमारी ढेरों बातें ………माँ की भाइयों की ऑफिस की रिश्तेदारों की ………….हम घर से ऑफिस या ऑफिस से घर आ जाते लेकिन हमारी बातें कभी ख़त्म न होती …………..

और आज भी जब कभी अकेलापन लगता है आप ही याद आते हो …बचपन में भी जब मैं अकेली हो जाती थी आप ही तो मेरे साथ गेम खेलते थे ढेर सारी किताबें मेरे लिए ..वीडियो गेम्स …और जाने क्या क्या …………

घर में जब भी भैया से किसी बात पर मैं लड़ पड़ती हमेशा आप ही मेरा साथ देते …..जब कि माँ हमेशा भैया के लिए …… भैया भी नाराज़  हो कर  अक्सर  कहता  था …तुम तो पापा कि बेटी हो …अब जाओ पापा के पास …….आप हम दोनों को समझाते ……. फिर हम एक हो जाते …….

आज जब भी मैं आइसक्रीम पार्लोर बच्चों को ले जाती हूँ या आइसक्रीम घर लाती हूँ …..आपकी याद छुप के चली आती है ….नही भूलता मुझे जब मैं अपनी बेटी को स्कुल लेने जाती उसे आइसक्रीम जरुर दिलाती ..और जब गाड़ी के पास आती आपकी हाथों में मेरे लिए आइसक्रीम होती थी …आप कहते थे कि मेरी भी बेटी आज भी इतनी ही छोटी है  माना कि तुम्हारे पास बेटी हो गयी है …..मैं जोर से हंस पड़ती थी और हस्ती आँखों से दो बूंद छलक पड़ते थे …..आइसक्रीम बहुत मीठी हो जाती थी ….याद है मुझे अब भी जब हम सब सफ़र में होते थे रात  के 1 बजे हों या ४ बस आइसक्रीम शॉप खुली दिख जाय ..मुझे दिलाये बिना आप आगे नही बढ़ते थे …..

हम घर से ऑफिस या ऑफिस से घर आ जाते लेकिन हमारी बातें कभी ख़त्म न होती …………..
और आज भी जब कभी अकेलापन लगता है आप ही याद आते हो …बचपन में भी जब मैं अकेली हो जाती थी आप ही तो मेरे साथ गेम खेलते थे ढेर सारी किताबें मेरे लिए ..वीडियो गेम्स …और जाने क्या क्या …………
घर में जब भी भैया से किसी बात पर मैं लड़ पड़ती हमेशा आप ही मेरा साथ देते …..जब कि माँ हमेशा भैया के लिए …… भैया भी नाराज़  हो कर  अक्सर  कहता  था …तुम तो पापा कि बेटी हो …अब जाओ पापा के पास …….आप हम दोनों को समझाते ……. फिर हम एक हो जाते …….
आज जब भी मैं आइसक्रीम पार्लोर बच्चों को ले जाती हूँ या आइसक्रीम घर लाती हूँ …..आपकी याद छुप के चली आती है ….नही भूलता मुझे जब मैं अपनी बेटी को स्कुल लेने जाती उसे आइसक्रीम जरुर दिलाती ..और जब गाड़ी के पास आती आपकी हाथों में मेरे लिए आइसक्रीम होती थी …आप कहते थे कि मेरी भी बेटी आज भी इतनी ही छोटी है  माना कि तुम्हारे पास बेटी हो गयी है …..मैं जोर से हंस पड़ती थी और हस्ती आँखों से दो बूंद छलक पड़ते थे …..आइसक्रीम बहुत मीठी हो जाती थी ….याद है मुझे अब भी जब हम सब सफ़र में होते थे रात  के 1 बजे हों या ४ बस आइसक्रीम शॉप खुली दिख जाय ..मुझे दिलाये बिना आप आगे नही बढ़ते थे …..

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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Alka के द्वारा
July 5, 2013

स्वेता जी , पापा लोग एसे ही होते है | हमें इतना प्यार देते है की ता -उम्र वो हमारे साथ रहता है | सुन्दर संस्मरण ..इसी से मिलती मेरी रचना मेरे पापा पढियेगा |

    Shweta के द्वारा
    August 1, 2013

    सही कहा बेटियों के लिए पापा तो …………… कभी कभी लगता है क़ि वो वक़्त फिर से लौट आये ….. सादर आभार

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
June 23, 2013

माता या पिता की अहमियत बच्चा तभी समझता जब वह खुद माता या पिता बन जाता है ! श्वेता जी, सुन्दर पोस्ट के लिए हार्दिक बधाई !

    Shweta के द्वारा
    August 1, 2013

    सादर आभार आपका वास्तव में बच्चे के लिए माता-पिता से बढ़कर दूसरा होता ही कौन है …………

yogi sarswat के द्वारा
June 20, 2013

शुद्ध मन से पिता को समर्पित ख़ास रचना है आपकी !

jayk के द्वारा
June 19, 2013

आपकी रचना हृदय को छू गयी,श्वेता जी.. :)

nishamittal के द्वारा
June 17, 2013

पिता के प्र्तिआप्कॆ भावपूर्ण स्मृतियाँ ह्रदय को छू लेने वाली हैं.

    Shweta के द्वारा
    June 17, 2013

    निशा जी ….. एक पिता तो सम्पूर्ण आकाश है …और आकाश शब्दों में कहाँ समाया है……..आपकी प्रतिक्रिया पा कर मन उत्साह से भर उठा ……सादर आभार आपका


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